बदलते दौर में खतम हो गई पतंगबाजी

कुमार दुष्यंत

हरिद्वार।

एक वक्त धर्मनगरी में दीपावली व होली के बाद बसंत पंचमी प्रमुख पर्व हुआ करता था।  पंचमी के दिन पतंगबाजी के मेलों के साथ साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन हुआ करता था। तब पंचपुरी में एक से बढ़कर एक नामी पतंगबाज हुआ करते थे। लेकिन बदलते दौर ने बसंत पंचमी की सारी आब खतम कर दी है।धर्मनगरी हरिद्वार में बसंत पंचमी पर एक वक्त पतंगबाजी के मेले लगा करते थे। अच्छे पतंगबाजों को इनाम से नवाजा जाता था। रोड़ी बेलवाला में वीर हकीकत राय की स्मृति में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता था। जबकि पंतद्वीप व नीलधारा के मजाड़े में पतंगबाजी के मुकाबले हुआ करते थे। समय के साथ साथ वह दौर अतीत का हिस्सा हो गया। पंचमी पर पतंग उड़ाने की परंपरा धर्मनगरी में अभी कायम है। लेकिन अब न पहले सी पतंगबाजी रही न पतंगबाज।पंचपुरी में एक से एक पतंगबाज रहे हैं। ज्वालापुर पतंगबाजों का गढ़ रहा है और यहां पतंगबाजी उस्तादों के हाथ में रही है। मैला उस्ताद ,अच्छन मियां ,फुरकान, इजहार अहमद आदि पतंगबाजों ने यहां खूब नाम कमाया। जीवन का 71 वां बसंत देख रहे प्रदेश व्यापार मंडल के उपाध्यक्ष अरविंद मंगल बताते हैं कि तब चौकबाजार के पास हाकम का कुंआं में बड़ा चबूतरा था।जिसपर पतंगबाजी के उस्ताद अपने हुनर दिखाया करते थे।कनखल में भी पुराने समय से पंचमी पर पतंगबाजी की परंपरा रही है। पूर्व पालिकाध्यक्ष प्रदीप चौधरी बताते हैं कि कनखल में चम्मी आचार्य, डा.केके बोस,सोहनलाल भाटिया, लिली भारद्वाज,बच्चू  जैसे एक से बढ़कर एक पतंगबाज रहे हैं।चौधरी बताते हैं कि जब ये लोग पतंग बढ़ाया करते थे तो दूसरे लोग अपनी पतंग उतार लिया करते थे। चौधरी बताते हैं कि वह दौर हमनें अपनी आंखों से देखा है जब यह पतंगबाज एक ही खींच में दर्जनों पतंग काटकर हवा में लहरा दिया करते थे।हरिद्वार में भी देवीदयाल, चंडी,मदनलाल भांडिया, जुग्गी, गंगाराम बब्बी, टिंडा, किशन मनचंदा जैसे पतंगबाजों ने पतंगबाजी में नाम कमाया।आरटीआई एक्टिविस्ट रमेशचंद्र शर्मा बताते हैं कि आज की पतंगबाजी में कोई नियम नहीं है। लेकिन एक वक्त इमानदारी की पतंगबाजी हुआ करती थी।यदि किसी के लंबे पेंच लड़ा करते थे तो दूसरे पतंगबाज उनकी पतंगबाजी में अपने पतंग फंसा कर व्यवधान नहीं डालते थे बल्कि उनके लंबे पेचों का आनंद लिया करते थे।रमेशचंद्र शर्मा बताते हैं कि तब कई दिनों पहले बसंत पंचमी की तैयारियां शुरू हो जाती थी और मांझे को गंगापार जाकर गोंद,सरेश,कांच और रंग के मिश्रण से सूता जाता था और पतंगबाजी के साथ ही अच्छी डोर सूतने वाले को भी उस्ताद माना जाता था

चाईनीज मांझे ने बिगाड़ा मजा
जब से चाईनीज मांझे का चलन बढ़ा है पतंगबाजी का मजा किरकिरा हो गया है।असल में यह मांझा न होकर ‘फिसिंग थ्रेड’ है। मजबूती के कारण चीन में इससे सजावटी और विशाल पतंगें उड़ाई जाती हैं। लेकिन इससे पेंच नहीं लड़ते बल्कि पतंगे उलझ जाती हैं।पर्यावरण के लिए भी घातक चाईनीज डोर के सस्ता होने के कारण इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।