आदिवासियों की बस्ती में काफी अलग तरीके से मनाया जाता है होली का त्योहार

देश में होली का त्यौहार बड़े जोश से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में भी होली का त्यौहार काफी उत्साहपूर्ण होता है। यह त्यौहार शहर से गांव में और गांव से आदिवासियों की बस्ती में काफी अलग तरीके से मनाया जाता है। इस त्यौहार की विशेषता हर एक  स्तर पर बदलती है और यही बात  महाराष्ट्र के आदिवसीयों में नजर  आती है। अंध, आरख, गोंड, कथोडी, भनिया, धोड़िआ जैसे विभिन्न समाजों में बंटे आदिवासी महाराष्ट्र में कुल जनसंख्या के 8.61प्रतिश है। इतनी कम मात्रा में होने के बावजूद ये आदिवासी  प्राचीन परमपराओं का आज भी जतन-संवर्धन करते है। एक समुदाय की परंपरा दूसरे  से भिन्न  क्यों न हो, होली का महत्त्व हर आदिवासी समाज में अनन्यसाधारण है और उनका होली के प्रति दृष्टिकोन अतुलनीय है। पूनम से अमावस तक और कई जगह अगली पूनम तक यह त्यौहार चलता है द्य प्रकृति से जुड़े इस आदिवासी समाज की होली का रिश्ता चन्द्रमा के चरण से, प्रजनन से, खेती से, वंश की वृद्धि से, नए रिश्तों से तथा निर्मल आनंद से है द्य महाराष्ट्र की पावरा, कोरकू और काथी समुदाय की होली की विशेष परम्पराएँ यहाँ उद्बोधित की है। जलगांव के करीब यावल में होली का त्यौहार एक महीना मनाया जाता है द्य हाथ से बनाया प्राकृतिक गुलाल इस्तेमाल कर सब आदिवासी जन पूरा महीना उत्सव मनाने में मशगूल होते है। इस उत्सव के दरम्यान पावरा समाज के लड़के अलंकार धारण कर अपनी होनेवाली पत्नी को ढूंढने पूरा गांव घूमते है और जो लड़की उन्हें पसंद करे उसके साथ विवाहबद्ध होते है द्य कमर में डमरू बंधे इन दूल्हे राजाओं को देखने गांव के सभी लोग आते है। सातपुडा की पहाड़ियों में बसे आदिवासीयों कि (की) होली भारत की बड़ी होलियों में से एक मानी जाती है। पंधरा दिन लगातार चलते इस उत्सव में हर एक गांव में सूर्योदय के साथ होलिका दहन करते करते करीब 1.5 लाख लोग एक गांव में  इकठ्ठा  होते  है। काथी होली में दहन करने के लिए एक महीने पहले जंगल में घूमकर  एक स्वस्थ और निरोगी बम्बू ढूंढा जाता है। किसी भी औजार का प्रयोग न करते  हुए उसे  हाथ से निकाल कर  लाया  जाता  है। इस एक बम्बू के इलावा अन्य कोई भी पेड़ होली के लिए काटना मना है। घर में मौजूद चुल्हे की लकड़ी जमा कर जब इस होलिका  का  दहन  होता है  तब  बम्बू  की लकड़ी सबसे  अंत में गिरती है द्य बम्बू  जिस दिशा में गिरे उस  दिशा को परख कर  गांव  के धार्मिक  प्रमुख  अगले साल की फसल, मौसम आदि का पूर्वानुमान करते है।