हर संकट से मुक्ति और मनवांछित फल पाने के लिए इस तरह करें शिव की स्तुति

आचार्य प्रवीण झा

शिव की महिमा

1. *शिवभक्त रावण*

राक्षसराज रावण बड़ा विद्वान और भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त माना जाता है। रावण के पास शिव से प्राप्त एक खास शिवलिंग भी था जिसकी पूजा कर उसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती थी।

2. *कुबेर की लंका हुई रावण की*

अपने सौतेले भाई कुबेर की खूबसूरत रचना लंका को उससे छीनकर रावण लंकापति बना था। इसके बाद उसका घमंड और भी बढ़ गया था। शिव का कृपापात्र होने के बावजूद इस घमंड ने उसे उनके कोप का भाजन भी बनाया।

3. *रावण की हैरानी*

रामायण के उत्तरखंड के अनुसार लंका जीतने के बाद पुष्पक विमान से स्वर्ण-नगरी जाते हुए रास्ते में उसे कैलाश पर्वत दिखा, लेकिन उसका ये अद्भुत विमान भी पर्वत के ऊपर से गुजरने में अक्षम था। इससे हैरान रावण को उसे शिव का वाहन नंदी दिखा और उसने इसका कारण पूछा।

4. *कैलाश पर्वत को उखाड़ने की कोशिश*

नंदी ने बताया कि ये भगवान शिव और पार्वती का निवास-स्थल है, इसलिए कोई अजनबी इस पर्वत के ऊपर से नहीं गुजर सकता। मतांध रावण ने इसे अपना अपमान समझा और पर्वत को उखाड़ने की कोशिश की। ऐसा नहीं कर पाने की स्थिति में इसको उखड़ने के लिए उसने अपने सभी बीस हाथ लगा दिए और कैलाश पर्वत बुरी तरह हिलने लगा।

5. *रावण को मिली सजा*

पार्वती ने घबराकर भगवान शिव से इसकी शिकायत की। शिव ने बात समझते हुए बस एक झटका दिया और रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया। वह दर्द से कराह उठा और शिव से क्षमा-याचना करने लगा।

6. *1000 वर्षों तक श्लोक पाठ*

तब उसके एक मंत्री ने शिव की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न करने और इस स्थिति से मुक्त पाने की सलाह दी। ज्ञानी रावण ने अपना एक सिर काटकर उसकी वीणा बनाई और श्लोकों का पाठ करना शुरु किया। 1000 वर्षों तक वह ये श्लोक पाठ करता रहा। अंतत: शिव उससे प्रसन्न हुए और इस यातना भरे बंधन से मुक्त किया।

7. *शिवतांडव स्त्रोत के लाभ*

रावण के पाठ किए वे श्लोक शिवतांडव स्तोत्र के नाम से जाने जाते हैं। कहते हैं इन श्लोकों में इतनी शक्ति है कि कितनी भी बड़ी परेशानी हो, इससे दूर किया जा सकता है। इसकी स्तुति से धन-धान्य पाने के अलावा रचनात्मक और कलात्मक निपुणता भी पाई जा सकती है।

8. *प्रचण्ड ताण्डव करने वाले शिव*

*जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्ग मालिकाम्‌। डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌* ॥१॥

अपने सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित गंगा की धाराओं से कंठ प्रक्षालित करने वाले, गले में लिपटे लंबे सर्प और डमरू की डम-डम के साथ प्रचण्ड ताण्डव करने वाले हे शिव, हमारा कल्याण करें!

9. *बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी*

*जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं* ॥२॥

10. *बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी*

जिन शिव जी के जटाओं में अतिवेग से विलास पूर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरें उनके शीश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालाएं धधक कर प्रज्वलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढता रहे।

11. *प्रमोद मानमानसे*

*धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि* ॥३॥

12. *विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित*

जो पर्वतराजसुता(पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनके कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आन्दित रहे।

13. *जटाभुजंगपिंगल*

*जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे। मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि* ॥४॥

14. *जटाओं में लिपटे सर्पों के फण*

मैं उन शिवजी की भक्ति में आन्दित रहूं जो सभी प्राणियों की के आधार एवं रक्षक हैं, जिनके जटाओं में लिपटे सर्पों के फण की मणियों के प्रकाश पीले वर्ण प्रभा-समुहरूपकेसर के कातिं से दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और जो गजचर्म से विभूषित हैं।

15. *जिनकी जटा पर लाल सर्प विराजमान है*

*सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः। भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः* ॥५॥

जिन शिव जी को देवगण अपने सर के पुष्प अर्पित करते हैं, जिनकी जटा पर लाल सर्प विराजमान है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

16. *इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करने वाले*

*ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिङ्गभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः* ॥६॥

जिसने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन किया, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म किया, जो सभी देवों द्वारा पूज्य तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्धि प्रदान करें।

17. *जिसने कामदेव को भस्म किया*

*करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके। धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम* ॥७॥

जिनके मस्तक से धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया, जो शिव प्रकृति रूपी पार्वती के स्तन के अग्र भाग पर सृजन रूपी चित्रकारी करने में अति चतुर है, उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो।

18. *जगत का बोझ धारण करने वाले*

*नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः* ॥८॥

जिनका कंठ मेघों की घटाओं से परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के सामान काला है, गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान, जगत का बोझ धारण करने वाले वे शिव जी हमें संपन्नता प्रदान करें।

19. *प्रफुल्लनीलपंकज*

*प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌। स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे* ॥९॥

20. *दु:खों के निवारक*

जिनका कण्ठ और कन्धा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुन्दर श्याम प्रभा से विभुषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दु:खों के काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।