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धधकते अंगारों पर आस्था का नृत्य

-जाख मेले में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
-जाख मंदिर में संपन्न हुई सदियों पुरानी अनूठी परंपरा
-नर पश्वा’ ने तीन बार अग्निकुंड में उतरकर दिया आशीर्वाद

रुद्रप्रयाग। आस्था, आध्यात्म और रोमांच का अद्भुत संगम जनपद के गुप्तकाशी क्षेत्र में देखने को मिला, जहां विश्व प्रसिद्ध ’जाख मेला’ हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस वर्ष भी सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, भगवान जाख के पश्वा (नर देवता) ने धधकते अंगारों के बीच नृत्य कर उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं को विस्मित किया।
मेले का मुख्य आकर्षण वह क्षण रहा जब ढोल-दमाऊ, भोंपू की थाप और “जय जाख देवता“ के गगनभेदी उद्घोष के बीच नर देवता ने दहकते अग्निकुंड में प्रवेश किया। इस बार भगवान जाख ने एक नहीं बल्कि तीन बार अग्निकुंड के भीतर जाकर नृत्य किया और भक्तों पर कृपा बरसाई। रोंगटे खड़े कर देने वाले इस दृश्य को देखकर न केवल श्रद्धालु, बल्कि आधुनिक विज्ञान के जानकार भी अचंभित रह गए।
नगर भ्रमण और स्नान परंपरा के अनुसार नर देवता को उनके मूल गांव से देवशाल स्थित विंध्यवासिनी मंदिर लाया जाता है। यहाँ से जाख की कंडी और जलते दीपक के साथ मंदिर प्रस्थान होता है। मंदिर परिसर में बांज के वृक्ष के नीचे ढोल सागर की विशेष थाप पर देवता अवतरित होते हैं, जिसके बाद उन्हें तांबे की गागर के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है।
नारायणकोटी, देवशाल और कोठड़ा गांवों के ग्रामीण मिलकर विशाल अग्निकुंड तैयार करते हैं। वैशाख संक्रांति की रात को जागरण के साथ अग्नि प्रज्वलित की जाती है और अगले दिन (द्वितीया) सुबह बड़ी लकड़ियां हटाकर केवल लाल अंगारों के बीच यह दिव्य नृत्य संपन्न होता है।

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