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दुर्घटना घटने के बाद स्कूलों की स्थिति की कलई खुली

400 से अधिक स्कूलों के भवन क्षतिग्रस्त

देहरादून। उत्तराखंड राज्य गठन के 22 साल बाद भी राज्य के स्कूलों की क्या स्थिति है? इसकी सच्चाई अब चंपावत के मौनकांडा स्कूल में हुई दुर्घटना के बाद सामने आ रही है। राज्य में बेहतर स्कूल और पढ़ाई का दावा करने वाले नेता और सरकारों ने इस दिशा में अब तक कितना काम किया है और सूबे की शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों की हालत क्या है यह हैरान करने वाली बात है। राज्य में ढाई हजार स्कूल ऐसे हैं जिनमें छात्रकृछात्राओं को पेयजल, बिजली और शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है जबकि 400 से अधिक स्कूलों के भवन ऐसी जर्जर स्थिति में है जिनमें शिक्षण कार्य कराया जाना सुरक्षित नहीं है।
उल्लेखनीय है कि चंपावत के मौनकांडा राजकीय विघालय में शौचालय का लेंटर गिरने से एक छात्र की मौत व पांच अन्य के घायल होने की घटना के बाद सीएम ने राज्य के सभी स्कूलों की सर्वे रिपोर्ट मांगी थी। जिसमें स्कूलों की कुछ ऐसी ही तस्वीरें सामने आई है। जहां बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। हालात इतने खराब है कि इन स्कूलों में अन्य सुविधाओं की बात तो दूर जरूरी सुविधाओं का भी नितांत अभाव है। इन स्कूलों में बच्चों के लिए पीने का पानी और शौचालय तक उपलब्ध नहीं है।
एक तरफ जहां केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा देशभर में घर-घर शौचालय बनवाने और देश को खुले में शौच से मुक्त कराए जाने का काम किया गया है। वहीं उत्तराखंड के स्कूलों में शौचालयों की सुविधा भी न होना इस बात को दिखाता है कि राज्य की अब तक की सरकारों द्वारा कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया है। अब तक राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों की कमी या छात्रों की कमी की बातें सामने आती थी जिसके कारण स्कूल में ताले लटकते जा रहे थे लेकिन अब इन स्कूलों के शिक्षा स्तर तथा इन स्कूलों की हालत भी सामने हैं। पहाड़ से पलायन रोकने के लिए सरकार कई काम कर रही है लेकिन क्या इन स्कूलों के हालात बिना सुधारे यह संभव है। राज्य में शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं के हालत अगर बेहतर नहीं होगें तो क्या पलायन रोका जा सकता है।

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